साधु संतों की आस्था का केंद्र है मस्तराम बाबा तपोभूमि आश्रम भक्तों ने बनाया मंदिर, अब विराजमान होगी बाबा की प्रतिमा।
कपिल शर्मा, 9753508589

कपिल शर्मा, हरदा एक्सप्रेस…
देवभूमि कहलाने वाले हिमाचल, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र सहित देश के अनेक प्रांतों के प्रसिद्ध त्यागी तपस्वी, बालब्रह्मचारी संत महात्मा बगैर किसी ताम-झाम के जहां आज भी आकर दंडवत करते हैं। जहां बाबा का भौतिक शरीर नहीं होने पर भी उनकी उपस्थिति का अहसास करते हुए आना अपने तपस्वी जीवन की उपलब्धि मानते हैं। उन ब्रह्मलीन श्री मस्तरामदास जी त्यागी महाराज की तपोस्थली हरदा हैं। जी हां, आपको शायद इस बात का अंदाजा भी नहीं कि हरदा की पावन भूमि पर ऐसे भी त्यागी तपस्वी संत रह कर तपस्या करते हुए अपनी देह त्याग कर ब्रह्मलीन हो चुके हैं, जिनके अखंड धूने पर आज भी दंडवत करने देश दुनिया के संत आते हैं। मां नर्मदा को अपना जीवन समर्पित कर चुके, केवल नर्मदा जल पर जीवित रहने वाले संत अवधूत दादा गुरु जिन्हें समर्थ सदगुरु दादा गुरु के नाम से भी पहचाना जाता है उन्होंने जब अपनी नर्मदा परिक्रमा दौरान हरदा नगर में प्रवेश किया तो वह सीधे मस्तराम बाबा के आश्रम पहुंचे। उन्होंने श्रद्धासुमन अर्पित करने पश्चात कहां था कि मेरे गुरुदेव का आदेश मिल चुका था कि इस मार्ग पर परम तपस्वी श्री मस्तरामदास जी त्यागी महाराज के तपोभूमि आश्रम पर जाना मत भूलना। गुरुदेव अपने साथ चलने वाले तमाम अनुयायियों को बिना कुछ बताएं सीधे मस्तराम बाबा आश्रम पहुंचे थे। इसी तरह इस स्थान पर वह संत मुर्तियां भी चाहें जब आती रहती है जिन्हें श्रद्धालु कुंभ या सिंहस्थ दौरान ही देख पाते हैं।उल्लेखनीय है कि वैसे तो मस्तराम बाबा के नाम से कुछ ओर स्थानों पर भी कुछ साधु-संत पहचाने जाते हैं, लेकिन लगभग सभी संत हरदा स्थित मस्तराम बाबा को पहले ही इस पदनाम से मान्यता दे चुके थे।
कौन थे मस्तराम बाबा…
बताया जाता है कि मस्तराम बाबा सन् 1984 में हरदा आएं थे। इससे पहले वह महाराष्ट्र में भुसावल के पास ताप्ती नदी के किनारे स्थित संकटमोचन हनुमान मंदिर में लंबे समय रहे। तत्पश्चात ओंकारेश्वर के महंत श्री राजाराम दास जी महाराज भीलवाड़ा वाले जिन्हें बड़े बाबा के नाम से भी जाना जाता था, उनके संपर्क में आने पर वह खेड़ीघाट ओंकारेश्वर आ गये। बड़े बाबा की जमात के साथ ही मस्तराम बाबा ने नर्मदा परिक्रमा भी की थी। खेड़ीघाट ओंकारेश्वर में रहने दौरान वह महंतजी बड़े बाबा के साथ ही हरदा में अजनाल नदी तट स्थित गुप्तेश्वर महादेव मंदिर आएं थे।

भक्तों की जुबानी बाबा की कहानी…
ब्रम्हलीन श्री मस्तरामदास जी त्यागी उर्फ मस्तराम बाबा 1984 से 2011 में शरीर छोड़ने तक हरदा में ही रहे थे। इस दौरान उनके अनुयायियों की एक लंबी फौज तैयार हो चुकी थी। बाबा के काफी नजदीक रहने वाले 78 वर्षीय राजेन्द्र उर्फ रज्जू बाबा त्यागी, मनोहर लाल शर्मा, विजय कुमार भार्गव ने अनौपचारिक बातचीत में बताया कि मस्तराम बाबा हरदा में पहले गुप्तेश्वर मंदिर में आकर रहने लगे थे। वहां से नर्मदा स्नान करने जाने और सीताराम कीर्तन करते हुए भक्तों के बीच अपनी पहचान कायम करना शुरू कर दिया। गुप्तेश्वर मंदिर में रहते हुए ही उनका सपंर्क भजन कीर्तन करने वाले विभिन्न लोगों से होने लगा था। चूंकि राजेन्द्र त्यागी जिन्हें भजन मंडलियों में रज्जू बाबा के नाम से जाना जाता है वह भजन के शौकीन होने के कारण बाबा से काफी निकटता हो गई। बाबा के भक्त मनोहर लाल शर्मा ने बताया कि इस दौरान कोर्ट वाले सुरेश कुमार लाड़ली बाबू जी और प्रभात तिवारी बाबा को गुप्तेश्वर मंदिर से मार्केटिंग सोसायटी के पास वाले वर्तमान स्थान पर ले आएं। यह स्थान यहां विराजमान ज्ञानदास जी महाराज के देवलोकगमन से काफी समय तक रिक्त पड़ा हुआ था। चूंकि ज्ञानदास जी महाराज भी सीताराम कीर्तन करने वाले संत थे और वह हरदा के ही रेलवे मालगोदाम के सामने स्थित गणेश जी तथा हनुमान मंदिर जो उस समय महज एक खुले चबुतरे के रूप में हुआ करता था वहां रहकर अपना कीर्तन किया करते थे। उन्होंने वहीं पर एक कच्ची झोपड़ी बना ली थी, जिसमें वह अपने हाथों से भोजन प्रसादी बनाकर भगवान को भोग लगाया करते थे। जब लाड़ली बाबू और प्रभात तिवारी ने मस्तराम बाबा को इस स्थान का दर्शन कराया तो मस्तराम बाबा यहां पहुंच कर अपने नाम अनुरुप मस्त हो गये। फिर तो ईश्वर प्रेरणा से वह अपने भौतिक शरीर को त्यागने तक यही के होकर रह गए। भक्तों के अनुसार मस्तराम बाबा सन् 1984 में इस स्थान पर आएं थे और तब से 25 जनवरी 2011 में शरीर छोड़ने तक यही पर रहे। रज्जू बाबा त्यागी बताते हैं कि वह एक बार मस्तराम बाबा के साथ उज्जैन कुंभ गये थे जहां संतों के अखाड़े में कुस्ती हो रही थी। मस्तराम बाबा ने इस कुस्ती में जब कुस्ती मारी तो उनकी जय-जयकार हो गई। वहां से बाबा को और प्रसिद्धि मिली। यही समय था जब मस्तराम बाबा के हरदा होने की सूचना संतों और भक्तों के माध्यम से प्रदेश ओर देश के अन्य संतों, महंतों, त्यागी तपस्वी महात्माओं तक पहुंची थी। फिर तो वह सब हरदा आने लगें। लेकिन मस्तराम बाबा के सशरीर रहने तक चाहें महंतों की जमात हो या किसी जमात अथवा अखाड़े के महंत महात्मा जब यहां आते थे तो मंदिर परिसर जो अब तपोभूमि आश्रम में तब्दील हो चुका था, वहां पहले मस्तराम बाबा की गुरु परंपरा अनुसार आज्ञा ली जाती थी तभी वहां प्रवेश किया जाता था। बाबा भी संतों की सेवा पूरे समर्पित भाव से करते थे। मनोहर लाल शर्मा ने बताया कि बाबा का संतो के प्रति लगाव देखने लायक होता था, जिसकी जो इच्छा होती थी वह पता नहीं कैसे वहां कहीं ना कहीं से आ ही जाती थी। बाबा कभी किसी से कुछ भी मांगते नहीं थे और ना ही पैसों के प्रति कोई मोह था। विजय कुमार भार्गव ने बताया कि उनके ऊपर तो बाबा की विशेष कृपा रही है बल्कि यह कहूंगा कि मेरी नौकरी और गृहस्थी की खुशाहाली सब बाबा के आर्शीवाद का ही फल है। वह जीव हिंसा के काफी खिलाफ थे, यहां तक कि अगर धूने की लकड़ी पर भी चिटी नजर आ जाएं तो वह लकड़ी धूने से बाहर निकाल लेते थे। वह शहर में ना तो कभी किसी से कुछ मांगने जाते थे और ना ही कही घूमने फिरने। उनकी पूरी दुनिया बस मंदिर और नाम जप ही थी। अगर कोई व्यक्ति अपनी समस्या भी बताता था तो वह कहते थे कि नाम जप करो, भजन करो भगवान सब ठीक कर देंगे। संत समाज में कुछ महात्मा मस्तराम बाबा को डबल सिगरेट वाले बाबा भी कहते थे। बाबा ने 1984 में अपने आने के बाद यहां धूना जलाया था, जिसकी आग ना तो उनके रहते कभी बुझीं और ना ही उनके शरीर छोड़कर चले जाने के बाद। आज भी इस अखंड धूने की आग भक्तों के समर्पण भाव से यथावत बनी हुई है।
मस्तराम बाबा के आश्रम पर जारी है सीताराम नाम जप…
हरदा स्थित मस्तराम बाबा के आश्रम पर इन दिनों सीताराम नाम जप चल रहा है। बीती 6 जुलाई को देव शयनी एकादशी से प्रारंभ हुआ यह नाम जप देव उठनी एकादशी 1 नवंबर तक अर्थात चातुर्मास निरंतर जारी है। उल्लेखनीय है कि मस्तराम बाबा यही सीताराम नाम जप किया करते थे। वैसे वह अपने भक्तों को गुरु मंत्र के रूप में जो तारक मंत्र देते थे वह श्रीकृष्ण गोविन्द मोहन मुरारी, मोहन मुरारी, हे राम मोहन मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवाय, हे नाथ नारायण वासुदेवाय, हे नाथ नारायण वासुदेवाय, हुआ करता था। बाबा के भक्तों ने बाबा के नाम जप को ही अपना आधार तारक नाम बनाया है। जिसके चलते जहां एक-दूसरे का अभिवादन सीताराम सीताराम नाम उच्चारण से ही करते हैं। वहीं वर्तमान में चौबीसों घंटे चार माह के लिए आश्रम में यह नाम जप प्रारम्भ कर रखा है। इस दौरान यहां उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र के विभिन्न संत आश्रमों से अनेक संत विभूतियों का आना-जाना लगा रहा। उल्लेखनीय है कि हरदा के भक्तों की पहल से मस्तराम बाबा के आश्रम का अब एक सुव्यवस्थित निर्माण लगभग पूर्णता की और है। जिससे यहां आकर ठहरने वाले साधु संतों को सुविधा उपलब्ध हो सके। वहीं आगामी दिनों में यहां मस्तराम बाबा की एक भव्य प्रतिमा भी स्थापित की जा रही है। इसी दौरान 5 नवंबर से 13 नवंबर तक वृंदावन के प्रसिद्ध कथावाचक श्री मदनमोहन महाराज श्री व्यास जी के मुखारविंद से श्रीराम कथा का भव्य आयोजन भी किया जा रहा है। स्थानीय कच्छकड़वा पाटीदार भवन में प्रति दोपहर 1 बजे से शाम 5 बजे तक श्रीराम कथा का अमृत बरसेगा, वहीं रात्रि को 8 बजे से क्षेत्रीय भजन मंडलियों द्वारा भजन कीर्तन की प्रस्तुति दी जाएगी।




